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कैमूर:नए कानून को लेकर भभुआ थाना में जागरूकता सभा

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एसपी कैमूर ने किया संबोधित,बताया क्या हुआ है बदलाव

सभा को संबोधित करते कैमूर एसपी ललित मोहन शर्मा।

कैमूर। आज भभुआ सदर थाना परिसर में नए कानून को लेकर जागरूकता कार्यक्रम का आयोजन किया गया जिसमें कैमूर आरक्षी अधीक्षक ललित मोहन शर्मा ने बताया कि आज 1 जुलाई से नया कानून लागू हो गया है जिसके तहत कानूनी प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है वहीं कार्यक्रम में भभुआ एसडीपीओ शिवशंकर कुमार,प्रखंड विकास पदाधिकारी सतीश कुमार,भभुआ थानाध्यक्ष मुकेश कुमार सहित सभी जनता के प्रतिनिधि ने कार्यक्रम में भाग लिया।

भारतीय संसद से पारित तीन नए आपराधिक कानून 1 जुलाई 2024 से लागू होने जा रहे हैं, जिसमें मानव अधिकारों व मूल्यों को केंद्र में रखा गया है। नए कानूनों में अब भारतीय दंड संहिता 1860 की जगह भारतीय न्याय संहिता 2023, दंड प्रक्रिया संहिता 1973 की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम 2023 लेगा, इन कानून में दंड की जगह न्याय पर विशेष बल दिया गया है।

न्याय पर केन्द्रित तीनों नए आपराधिक कानून को राज्य में प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए बिहार पुलिस पूरी तरह से तैयार है। राज्य के 25 हजार से भी अधिक पुलिस पदाधिकारियों/कर्मियों को नए कानूनों में हुए बड़े बदलावों से जुड़ी ट्रेनिंग दी जा चुकी है। साथ ही आमलोगों को भी वीडियोज, ग्राफिक्स, इन्फोग्राफिक्स एवं अन्य माध्यमों से नए कानूनों के प्रति लगातार जागरूक कर इससे जुड़ी भ्रांतियों को दूर किया जा रहा है।

नए कानून में डिजिटल तौर पर FIR, नोटिस, समन, ट्रायल, रिकॉर्ड, फॉरेंसिक, केस डायरी एवं बयान आदि को संग्रहित किया जाएगा। तलाशी और जब्ती के दौरान वीडियोग्राफी, फोटोग्राफी के लिए बिहार पुलिस के सभी अनुसंधानकर्ताओं को लैपटॉप और मोबाइल उपलब्ध कराये जायेंगे। प्रत्येक थानों का नए उपकरणों के साथ आधुनिकीकरण किया जा रहा है अब हर थाने में वर्क स्टेशन, डाटा सेंटर तथा अनुसंधान हॉल, रिकॉर्ड रूम और पूछताछ कक्ष का जल्द ही निर्माण होगा।

बढ़ते हुए साइबर अपराध पर नियंत्रण एवं डिजिटल सबूतों के प्रबंधन, अनुसंधान एवं साइबर सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए विधि विज्ञान प्रयोगशाला, बिहार, पटना तथा बिहार पुलिस अकादमी, राजगीर में स्थित क्षेत्रीय विधि विज्ञान प्रयोगशाला में साइबर फॉरेंसिक प्रयोगशाला की एक-एक इकाई (कुल दो इकाइयां) स्थापित की जा रही है।

नागरिक व पीड़ित केन्द्रित तीन नए आपराधिक कानून व्यक्तिगत, अभिव्यक्ति के स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह भारत द्वारा, भारत के लिए और भारतीय संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अनुसार संचालित होगी एवं इन कानूनों में समानता और निष्पक्षता के साथ न्याय पर बल दिया गया है। जिससे व्यवस्था को मजबूत बनाने के साथ-साथ सभी के लिए त्वरित न्याय सुनिश्चित की जा सके।

नागरिक केन्द्रित कानून

नए आपराधिक कानून को नागरिक केन्द्रित बनाने की दिशा में बड़ी पहल

▶ नागरिक घटनास्थल या उससे परे कहीं से भी FIR दर्ज करा सकते हैं।

▶ पीड़ित, FIR की एक निःशुल्क प्रति प्राप्त करने के हकदार हैं।

▶ पुलिस द्वारा पीड़ित को 90 दिनों के अंदर जांच की प्रगति के बारे में सूचित करना अनिवार्य है।▶ महिला अपराध की स्थिति में 24 घंटे के अंदर पीड़िता की सहमति से उसकीमेडिकल जांच की जाएगी। साथ ही 7 दिनों के अंदर चिकित्सक उसकी मेडिकल रिपोर्ट भेजेंगे।

▶ अभियोजन पक्ष की मदद के लिए नागरिकों को खुद का कानूनी प्रतिनिधित्व करने का अधिकार है।

▶ BNS की धारा 396 एवं 397 में पीड़ित को मुआवजे और मुफ्त इलाज का अधिकार दिया गया है।

▶ BNS की धारा 398 के अंतर्गत गवाह संरक्षण योजना का प्रावधान है।•केस वापसी के पहले न्यायालयों को पीड़ित की बात सुनने का अधिकार दिया गया है।

• कोर्ट में आवेदन करने पर पीड़ितों को ऑर्डर की निःशुल्क कॉपी प्राप्त करने का अधिकार मिला है।

» कानूनी जांच, पूछताछ और मुकदमे की कार्यवाही को इलेक्ट्रॉनिक रूप से आयोजित करने का प्रावधान है।न्याय प्रणाली में टेक्नोलॉजी पर जोर

▶ क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के सभी चरणों का डिजिटल रूपांतरण किया गया है, जिनमें e- समन, e- नोटिस, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेज प्रस्तुत करना और e- ट्रायल शामिल हैं।

▶ पीड़ित ई-बयान दे सकते हैं। साथ ही इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से गवाहों, अभियुक्तों, विशेषज्ञों और पीड़ितों की उपस्थिति के लिए e-Appearance की शुरुआत की गई है।

▶ ‘दस्तावेजों’ की परिभाषा में सर्वर लॉग, स्थान संबंधी साक्ष्य और डिजिटल वॉयस संदेश को शामिल किया गया है। अब अदालतों में इलेक्टॉनिक साक्ष्य को फिजिकल एविडेंस के बराबर माना जाएगा।

▶ कानून के तहत सेकेंडरी एविडेंस का दायरा बढ़ा दिया गया है। इसमें मौखिक एवं लिखित स्वीकारोक्ति और दस्तावेज की जांच करने वाले कुशल व्यक्ति का साक्ष्य शामिल है।

▶ तलाशी और जब्ती की वीडियोग्राफी की जाएगी।

महिलाएं और बच्चे

▶ महिलाओं और बच्चों के साथ होने वाले अपराध से निपटने के लिए नए आपराधिक कानूनों में 37 धाराओं को शामिल किया गया है।

▶ पीड़ित और अपराधी दोनों के संदर्भ में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों को जेंडर न्यूट्रल बनाया गया है।

▶ 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार करने पर दोषी को आजीवन कारावास या मृत्युदंड की सजा मिलेगी।

▶ झूठे वादे या नकली पहचान के आधार पर यौन शोषण करना अब आपराधिक कृत्य माना जाएगा।

▶ चिकित्सकों के लिए 7 दिनों के अंदर बलात्कार पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट जांच अधिकारी के पास भेजना अनिवार्य है।

अपराध एवं दंड को नए तरीके से किया गया परिभाषित

▶ छीनाझपटी (स्नैचिंग) एक गंभीर और नॉन-बेलेबल (गैर-जमानती) अपराध है।

▶ भारत की एकता, अखंडता, संप्रभुता, सुरक्षा व आर्थिक सुरक्षा के लिए खतरा पैदा करने या किसी समूह में आतंक फैलाने के लिए किए गए कृत्यों को आतंकवादी गतिविधि मानी जाएगी।

▶ ‘राजद्रोह’ की जगह ‘देशद्रोह’ शब्द इस्तेमाल किया गया है, जिसमें भारत की एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाली आपराधिक गतिविधि शामिल है।

▶ मॉब लिंचिंग करने पर अब दोषियों को मृत्युदंड की सजा मिलेगी।

▶ नए कानून में संगठित अपराध को स्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

त्वरित न्याय

▶ एक तय समय सीमा के अंदर न्याय दिलाने के लिए BNS में 45 धाराओं को जोड़ा गया है।

▶ किसी भी मामले पर पहली सुनवाई शुरू होने के 60 दिनों के अंदर आरोप तय किए जाएंगे।

▶ आरोप तय होने के 90 दिन बाद घोषित अपराधियों की अनुपस्थिति में भी कानूनी कार्यवाही (अभियोजन) शुरू हो जाएगी।

▶ अभियोजन के लिए मंजूरी, दस्तावेजों की आपूर्ति, प्रतिबद्ध कार्यवाही, डिस्चार्ज याचिका को दाखिल करना, आरोप तय करना, निर्णय की घोषणा और दया याचिकाओं को दाखिल करना निर्धारित समय सीमा के भीतर पूरा करना अनिवार्य किया गया है।

▶ आपराधिक कार्यवाही में कोर्ट को दो से अधिक स्थगन देने की अनुमति नहीं है।

▶ समय जारी करने और उसकी तामील करने तथा न्यायालय के समक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करने के लिए टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाएगा।

आपराधिक न्याय प्रणाली (क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम) में बदलाव

▶ मजिस्ट्रेट को 3 वर्ष तक के कारावास की सजा वाले मामलों में समरी ट्रायल करने का अधिकार है।

▶ समय पर न्यायः मामले पर पहली सुनवाई शुरू होने के 60 दिनों के अंदर आरोप तय होना चाहिए। किसी भी आपराधिक अदालत में मुकदमे के समापन के बाद निर्णय की घोषणा में 45 दिनों से अधिक समय नहीं लगेगा।

▶ अभियोजन निदेशालयः राज्य में एक अभियोजन निदेशालय स्थापित होगा, जिसके अंतर्गत प्रत्येक जिले में जिला अभियोजन निदेशालय होंगे।

▶ अभियोजन निदेशालय न्यायालयों में मामलों की कार्यवाहियों के जल्द निपटारे और अपील फाइल करने पर अपनी राय देने के साथ-साथ उसे मॉनीटर करेंगे।

▶ सभी पूछताछ और परीक्षण इलेक्ट्रॉनिक मोड में भी आयोजित किया जा सकता है।

▶ विचाराधीन कैदियों की रिहाई: पहली बार अपराध करने वाले अपराधियों को रिहा किया जा सकता है, यदि विचाराधीन कैदियों की हिरासत अवधि सजा की एक तिहाई तक पहुंच जाती है।

पुलिस की जवाबदेही और पारदर्शिता

▶ कोई भी गिरफ्तारी, ऐसे अपराध के मामलों में जो तीन वर्ष से कम के कारावास से दण्डनीय है और ऐसा व्यक्ति जो गंभीर बीमारी से पीड़ित है या 60 वर्ष से अधिक की आयु का है, ऐसे अधिकारी, जो पुलिस उप-अधीक्षक से नीचे की पंक्ति का न हो, की पूर्व अनुमति के बिना नहीं की जाएगी।

▶ गिरफ्तारी, तलाशी, जब्ती और जांच में पुलिस की जवाबदेही बढ़ाने के लिए 20 से अधिक धाराएं शामिल की गई हैं।

▶ असंज्ञेय मामलों में दैनिक डायरी रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को 15 दिनों के अंतराल पर भेजी जाएगी।

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